Man

अभी भी मन करता है

घूम आऊं किताबों के मेले में

पलटूं एक-एक पन्ना

और घर आऊं

तो तैयार मिले मां के हाथों का खाना

पिता की चिंता

 

लौटूं

तो इत्मीनान से खोलूं

किताबों का थैला

महसूसूं खुशबू ताजे छपे पन्नों की

उनकी जिल्द पर जडूं इतिहास होता वर्तमान-

अपना नाम, तारीख, साल

 

फिर उन्हें दूं जिल्द का तकिया

उन्हें सहलाऊं

तकिए के पास रख

मजे से सो जाऊं

 

सुबह पहली नजर फिर जाए

इन्हीं मीठे बेरों पर

उन्हें बता दूं छुअन से

दफ्तर से आते ही

दिमागी सैर करूंगी इनके साथ

 

अभी भी मन करता है

न जाने क्या-क्या